• الصفحة الرئيسيةخريطة الموقعRSS
  • الصفحة الرئيسية
  • سجل الزوار
  • وثيقة الموقع
  • اتصل بنا
English Alukah شبكة الألوكة شبكة إسلامية وفكرية وثقافية شاملة تحت إشراف الدكتور سعد بن عبد الله الحميد
الدكتور سعد بن عبد الله الحميد  إشراف  الدكتور خالد بن عبد الرحمن الجريسي
  • الصفحة الرئيسية
  • موقع آفاق الشريعة
  • موقع ثقافة ومعرفة
  • موقع مجتمع وإصلاح
  • موقع حضارة الكلمة
  • موقع الاستشارات
  • موقع المسلمون في العالم
  • موقع المواقع الشخصية
  • موقع مكتبة الألوكة
  • موقع المكتبة الناطقة
  • موقع الإصدارات والمسابقات
  • موقع المترجمات
 كل الأقسام | مقالات شرعية   دراسات شرعية   نوازل وشبهات   منبر الجمعة   روافد   من ثمرات المواقع  
اضغط على زر آخر الإضافات لغلق أو فتح النافذة اضغط على زر آخر الإضافات لغلق أو فتح النافذة
  •  
    حقوق الفقراء والمساكين في الاسلام
    د. أمير بن محمد المدري
  •  
    تكوة أهل الجنة وأناسها (خطبة)
    د. أيمن منصور أيوب علي بيفاري
  •  
    أصول الفضيلة
    مالك بن محمد بن أحمد أبو دية
  •  
    حديث: لا تحد امرأة على ميت فوق ثلاث
    الشيخ عبدالقادر شيبة الحمد
  •  
    المجيء والإتيان
    الشيخ عبدالعزيز السلمان
  •  
    أحكام صلاة العاري
    يوسف بن عبدالعزيز بن عبدالرحمن السيف
  •  
    الغفلة أثرها وضررها (خطبة)
    د. هيثم بن عبدالمنعم بن الغريب صقر
  •  
    من أدله صدقه عليه الصلاة والسلام الشواهد الواقعية ...
    الشيخ عبدالله محمد الطوالة
  •  
    استراتيجية ذاتية لمواجهة أذى الناس
    د. محمود حسن محمد
  •  
    خطبة: إدمان المخدرات
    عدنان بن سلمان الدريويش
  •  
    دور المسلم في محيطه (خطبة)
    د. عبدالرزاق السيد
  •  
    خطبة: سوء الخلق (مظاهره، أسبابه، وعلاجه)
    أ. د. حسن بن محمد بن علي شبالة
  •  
    تعظيم شأن الجمعة والتذكير ببعض أحكامها (خطبة)
    د. أيمن منصور أيوب علي بيفاري
  •  
    هدايا الرزق
    سمر سمير
  •  
    خطبة: لا تحزن
    عبدالعزيز أبو يوسف
  •  
    خطبة: (بدعة المولد والفساد)
    الدكتور علي بن عبدالعزيز الشبل
شبكة الألوكة / آفاق الشريعة / منبر الجمعة / الخطب / خطب بلغات أجنبية
علامة باركود

من مشكاة النبوة (4) في مهنة أهله (باللغة الهندية)

من مشكاة النبوة (4) في مهنة أهله (باللغة الهندية)
حسام بن عبدالعزيز الجبرين

مقالات متعلقة

تاريخ الإضافة: 18/5/2022 ميلادي - 17/10/1443 هجري

الزيارات: 5907

 حفظ بصيغة PDFنسخة ملائمة للطباعة أرسل إلى صديق تعليقات الزوارأضف تعليقكمتابعة التعليقات
النص الكامل  تكبير الخط الحجم الأصلي تصغير الخط
شارك وانشر

शीर्षक:

अपने परिवार की सेवा में व्‍यस्‍त रहते


प्रथम उपदेश:

प्रशंसाओं के पश्‍चात


मैं आप को और स्‍वयं को अल्‍लाह का तक्‍़वा(धर्मनिष्ठा)अपनाने और पुण्‍य के कार्य करने की वसीयत करता हूँ।

﴿ فَمَن يَعْمَلْ مِنَ الصَّالِحَاتِ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَا كُفْرَانَ لِسَعْيِهِ وَإِنَّا لَهُ كَاتِبُونَ ﴾ [الأنبياء:94]

अर्थात:फिर जो सदाचार करेगा और वह एकेश्‍वरवादी हो,तो उस के प्रयास की उपेक्षा नहीं की जायेगी,और हम उसे लिख रहे हैं


रह़मान के बंदोआइए हम पैगंबर के घर का निरीक्षणकरते हैं,वह घर जिस से अल्‍लाह ने प्रत्‍येक प्रकार के मलिनताको दूर कर दिया और उसे पूरे तौर पर पवित्र कर दिया,आइए हम उस घर में उस रोशनदान से झांकते हैं जिसे हमारी माता आयशा रज़ीअल्‍लाहु अंहा ने खोला था,जब कुछ ताबई़न ने आप से उस महान हस्ति के विषय में पूछा जिन के कांधों पर उम्‍मत का बोझ था कि वह जब घर में प्रवेश करते और दरवाजा बंद कर लेते तो उनकी क्‍या स्थिति हुआ करती थी


बोखारी ने अपनी सह़ी में अपनी सनद से अलअसवद की रिवायत नकल की है,वह कहते हैं:मैं ने आयशा से नबी के घरेलू कार्यरतताके विषय में प्रश्‍न किया तो उन्‍हों ने फरमाया:आप अपने परिवार वालों की सेवा में व्‍यस्‍त रहते और जब नमाज़ का समय होता तो आप नमाज़ के लिये जाते।


मुस्‍नद अह़मद की रिवायत में है कि:आयशा रज़ीअल्‍लाहु अंहा से प्रश्‍न किया गया:अल्‍लाह के रसूल घर में क्‍या काम किया करते थेउन्‍हों ने कहा:आप मनुष्‍यों में से एक मनुष्‍य थे,जूओं के कारण अपने कपड़े स्‍वयं टटोल लिया करते थे,बकरी का दूध दुह लेते,और अपनी सेवा के कार्य स्‍वयं कर लिया करते थे।(इसे अल्बानी ने सह़ी कहा है) (सह़ी इब्‍ने हि़ब्‍बान में यह शब्‍द आए है:अपनी जूती स्‍वयं टांक लेते,कपड़े भी स्‍वयं ही सिल लेते और बरतन भी स्‍वयं ही सुधार लेते।


मेरे प्‍यारोआइए हम ठहर कर कुछ बिंदुओं पर विचार करें:

प्रथम बिंदु:आप मनुष्‍यों में से एक मनुष्‍य थेअत: आप घर में सरदार एवं नेता के रूप में नहीं बल्कि पति के रूप में प्रवेश होते,ताकि अपने परिवार वालों के साथ शांतिपूर्वक वैवाहिक जीवन गुजारें,पारिवारिक जीवन की सादगी एवं आत्‍मीयता का आनंद उठाएं।


द्वतीय बिंदु:फरमाती हैं:आप अपने परिवार के सदस्‍यों की सेवा में व्‍यस्‍त रहतेयहां यह प्रश्‍न पैदा होता है,क्‍या माता आयशा रज़ीअल्‍लाहु अंहा को अधिक एवं कठिन कार्यों की शिकायत थी कि नबी उनकी सहायता और सेवा करेंक्‍या उनके कमरे की दीवारें निकट निकट न थीं,उसका विस्‍तार बहुत मामूली न थी,इस प्रकार कि उसकी लंबाई दस हाथ और चौड़ाई सात हाथ से अधिक न थीजिस का माप आज के अनुसार तकरीबन पांच मीटर(लंबाई)और साढ़े तीन मीटर)चौड़ाई) बनती हैजो कि हमारे घरों के केवल एक कमरा के बराबर है اللہ المستعان

 

क्‍या उन्‍हों ने नहीं बताया कि तीन महीने गुजर जाते थे किन्‍तु घर का चूल्‍हा न जलता कि खाना बनाया जाएदो महीने और कभी कभी तो इस से भी अधिक समय गुजर जाताकिन्‍तु खाना नहीं बनता,बल्कि केवल खजूर और पानी से गुजारा होता था


तथा वह एक युवती थी जिस के पास बच्‍चों का देखभाल भी न थातो भला कोई ऐसा काम रहा होगा जो परिश्रम चाहता होकोई ऐसा काम हो जिस को करने के लिए सहायता की आवश्‍यकता हो


जान लें(इसका आशय)एक गहरा अर्थ को करने में सहायता करना है,जो कि आपसी सहानुभूति और वैवाहिक जीवन में आपसी भागेदारी को दर्शाना है,और पत्‍नी से राहत प्राप्‍त करने के अनेक अर्थों में से एक महत्‍वपूर्ण अर्थ को दर्शाना है:

﴿ وَمِنْ آيَاتِهِ أَنْ خَلَقَ لَكُم مِّنْ أَنفُسِكُمْ أَزْوَاجاً لِّتَسْكُنُوا إِلَيْهَا ﴾ [الروم: 21]

अर्थात:तथा उस की निशानियों(लक्षणों)में से यह(भी)है कि उतपन्‍न किया तुम्‍हारे लिये तुम्‍ही में से जोड़े,ताकि तुम शान्ति प्राप्‍त करो उनके पास


अल्‍लाह तआ़ला ने यह नहीं कहा कि:ताकि तुम उसके साथ रहो।


तीसरा बिंदु:हम उस रौशनदान से नबी के उस घर का दर्शन करते हैं जो क्षेत्रफल में बहुत छोटा था,जिस मे सामन बड़े साधारण थे,किन्‍तु उसमें रहने वाले बड़े दिल के थे,उनका हृदय खुला था,आपस में प्रेम था,जिस से सौभाग्‍य एवं आध्‍यात्मिकता,प्रसन्‍नता एवं पवित्र जीवन का नहर फूटता था।


अल्‍लाह के रसूल की जीवनी में आयशा रज़ीअल्‍लाहु अंहा का यह कथन आया है कि:आप तुम्‍हारे ही जैसा पुरुष थे,किन्‍तु आप बहुत हंसमुख और आनन्दितथे।चिरचिरे और गोस्‍साकरनेवाले न थे,बल्कि आध्‍यात्मिक सुंदरता और मुसकुराहट के लगाव से आपका घर आबाद था।


चौथा बिंदु:(पत्‍नी का) साथ देने के लिए पति का स्‍वयं से प्रसन्‍नता के साथ पहल करना पत्‍नी के दिल और उसके मन में इसका बड़ा स्‍थान है,उसकी उपस्थिति‍ को सुखदाई और उसकी अनुपस्थिति को वंचन और भ्‍यावक बना देती है।


मेरे प्रियोजिय व्‍यक्ति के वैवाहिक जीवन में आनंद न हो,उसको इस पैगंबरी पाठ से लाभ उठाना चाहिए ताकि पत्‍नी का साथ देने और मुसकुरा कर उससे मिलने से उसके जीवन में प्रसन्‍नता भर जाए।


अल्‍लाह मुझे और आप को क़ुरान एवं ह़दीस से लाभ पहुंचाए,उनमें जो आयतें और नीतियों की बातें हैं,उन्‍हें हमारे लिए लाभदायक बनाए,आप अल्‍लाह से क्षमा प्राप्‍त करें,नि:संदेह वह अति क्षमाशील है।


द्वतीय उपदेश:

الحمد لله القائل ﴿ لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّهَ كَثِيراً ﴾ [الأحزاب: 33] وصلى الله وسلم على الرحمة المهداة والنعمة المسداة محمد بن عبد الله وعلى آله وصحبه.


प्रशंसाओं के पश्‍चात:

पैगंबरी जीवन का यह संतुलन हमें कितना आश्‍चर्य में डाल देता है कि अल्‍लाह के रसूल लोगों के सामने अधिक मुस्‍कुराते,और अपने घर में हसमुख और मुस्‍कुराते चेहरे के साथ रहते,लोगों के साथ खैर व भलाई करने में चलती हवा के जैसा थे,अपने घर में परिवार के सदस्‍यों के काम में व्‍यस्‍त रहते,आप लोगों के लिए समस्‍त लोगों में र्स्‍वोत्‍तम थे और लोगों में सबसे अधिक अपने परिवार वालों के लिए अच्‍छे थे।


यह संतुलन ऐसे लोगों के अंदर लुप्‍त है जो लोगों के साथ अपने व्‍यवहार में सहज व्‍यवहार अपनाते हैं,किन्‍तु अपने परिवार वालों के साथ कठोरता अपनाते हैं,अल्‍लाह का दरुद व सलाम हो उस नबी पर जिनका सुंदर व्‍यवहार समस्‍त लोगों के समान था,और लोगों में सबसे अधिक उनके परिवार के सदस्‍य उनके सुंदर व्‍यवहार से लाभान्वित होते थे।


आदरणीय श्रोतायह पैगंबरी पाठ हर उस व्‍यक्ति के लिए खुला संदेश है जो قوّامیت (सरदारी)का गलत अर्थ समझते हैं,केवल अपना प्रभुत्‍व जतलाने के लिए इसका दुरुपयोग करते हैं,वह इस प्रकार से कि जब उनको जब देखें गोस्‍से में नजर आते हैं और जब सुनें आदेश दे रहे होते हैं अथवा सचेत कर रहे होते हैं।


अंतिम बात:अल्‍लाह तआ़ला माता आयशा से प्रसन्‍न हो जो अल्‍लाह की नीति से नबी की मुत्‍यु के पश्‍चात तकरीबन आधी शताबदी त‍क जीवित रहीं,आप नबी के घर के लिए खुले रोशनदान बन कर रहीं,जिससे उम्‍मते मोह़म्‍मदिया को अपने नबी का जीवन शैली साफ साफ दिखता रहा,अल्‍लाह उन से प्रसन्‍न हो और उन्‍हें प्रसन्‍न करे और उम्‍मते मोह़म्‍मदिया की ओर से उनको र्स्‍वोत्‍तम एवं पूरा पूरा बदला प्रदान करे।


दरूद व सलाम पढ़ें...

 





 حفظ بصيغة PDFنسخة ملائمة للطباعة أرسل إلى صديق تعليقات الزوارأضف تعليقكمتابعة التعليقات
شارك وانشر

مقالات ذات صلة

  • من مشكاة النبوة (1) "يا معاذ بن جبل"
  • من مشكاة النبوة (3) ذو العقيصتين (خطبة)
  • من مشكاة النبوة (2) فيك جاهلية!
  • من مشكاة النبوة (4) في مهنة أهله
  • من مشكاة النبوة (5) "يا أم خالد هذا سنا" (خطبة)
  • من مشكاة النبوة (6) "أين ابن عمك؟" (خطبة)
  • من مشكاة النبوة (7) الطفلة والصلاة!! (خطبة)
  • من مشكاة النبوة (8) حفظ الجميل
  • من مشكاة النبوة (9) عجب الله من صنيعكما
  • من مشكاة النبوة (6) "أين ابن عمك؟" (باللغة الأردية)
  • من مشكاة النبوة (7) الطفلة والصلاة!! (باللغة الأردية)
  • ضرورة طلب الهداية من الله (باللغة الهندية)
  • الله الكريم الأكرم (خطبة) (باللغة الهندية)
  • من مشكاة النبوة (6) "أين ابن عمك" (خطبة) (باللغة الهندية)
  • من مشكاة النبوة (4) في مهنة أهله (خطبة) (باللغة الإندونيسية)

مختارات من الشبكة

  • تعظيم قدر الصلاة في مشكاة النبوة - بلغة الإشارة (PDF)(كتاب - مكتبة الألوكة)
  • من مشكاة النبوة (5) "يا أم خالد هذا سنا" (خطبة) - باللغة النيبالية(مقالة - آفاق الشريعة)
  • الأربعون في التوحيد من صحيحي البخاري ومسلم (PDF)(كتاب - مكتبة الألوكة)
  • أمهات المؤمنين رضي الله عنهن (10) أم سلمة رضي الله عنها في بيت النبوة(مقالة - موقع الشيخ إبراهيم بن محمد الحقيل)
  • إثبات النبوة (2)(مقالة - موقع د. أمين بن عبدالله الشقاوي)
  • إثبات النبوة (1)(مقالة - موقع د. أمين بن عبدالله الشقاوي)
  • القسط الهندي من دلائل النبوة وأفضل ما يتداوى به(مقالة - موقع الشيخ عبدالرحمن بن سعد الشثري)
  • المراهقون بين هدي النبوة وتحديات العصر (خطبة)(مقالة - آفاق الشريعة)
  • إطلالة على أنوار من النبوة(مقالة - موقع الشيخ الدكتور عبدالله بن ضيف الله الرحيلي)
  • من دروس خطبة الوداع: أخوة الإسلام بين توجيه النبوة وتفريط الأمة (خطبة)(مقالة - آفاق الشريعة)

 



أضف تعليقك:
الاسم  
البريد الإلكتروني (لن يتم عرضه للزوار)
الدولة
عنوان التعليق
نص التعليق

رجاء، اكتب كلمة : تعليق في المربع التالي

مرحباً بالضيف
الألوكة تقترب منك أكثر!
سجل الآن في شبكة الألوكة للتمتع بخدمات مميزة.
*

*

نسيت كلمة المرور؟
 
تعرّف أكثر على مزايا العضوية وتذكر أن جميع خدماتنا المميزة مجانية! سجل الآن.
شارك معنا
في نشر مشاركتك
في نشر الألوكة
سجل بريدك
  • بنر
  • بنر
كُتَّاب الألوكة
  • تكريم 540 خريجا من مسار تعليمي امتد من الطفولة حتى الشباب في سنغافورة
  • ولاية بارانا تشهد افتتاح مسجد كاسكافيل الجديد في البرازيل
  • الشباب المسلم والذكاء الاصطناعي محور المؤتمر الدولي الـ38 لمسلمي أمريكا اللاتينية
  • مدينة كارجلي تحتفل بافتتاح أحد أكبر مساجد البلقان
  • متطوعو أورورا المسلمون يتحركون لدعم مئات الأسر عبر مبادرة غذائية خيرية
  • قازان تحتضن أكبر مسابقة دولية للعلوم الإسلامية واللغة العربية في روسيا
  • 215 عاما من التاريخ.. مسجد غمباري النيجيري يعود للحياة بعد ترميم شامل
  • اثنا عشر فريقا يتنافسون في مسابقة القرآن بتتارستان للعام السادس تواليا

  • بنر
  • بنر

تابعونا على
 
حقوق النشر محفوظة © 1447هـ / 2025م لموقع الألوكة
آخر تحديث للشبكة بتاريخ : 8/6/1447هـ - الساعة: 8:5
أضف محرك بحث الألوكة إلى متصفح الويب